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पढ़ाई में मन लगाने के लिए कहानी

 पढाई ना करने के हजारों बहाने जो मेरे लक्ष्यों से भी ऊंचे कद के थे, मैं बहानों को सत्य सिद्ध करने को कई तर्कों को बुनने लगी। मन में छिड़ी इस बहस पर खलल डालते हुए नन्हे बच्चों की किलकारी ने बहस पर अनिश्चित समय के लिए रोक लगा दी थी। खिड़की से बाहर झांका तो चार बच्चे 'चार लोग क्या कहेंगे' की उक्ति के कठोर विरोधक; बिना किसी दिखलावट के नाचते हंसते मानो संसार के सभी दुखों, बंधनों से मुक्त एक आजाद पंछी की तरह प्रकृति के कोमल स्पर्शो को महसूस करते हुए आनंद के आकाश में गोता लगा रहे हो।          उनके चेहरे कि प्राकृत मुस्कान के पीछे छिपी कई जिम्मेदारी ,दुख ,अभाव को मैं स्पष्ट रूप से देख सकती थी। महज  छः वर्ष की बच्ची,  मां की जिम्मेदारी निभाते छः महीने के भाई को पीठ में चुनरी के सहारे बांधे दोनों हाथों से महज दो और तीन साल के भाई को पकड़े एक गाड़ी के शीशे में खुद को देखकर उत्साहित हो रहे थे मानो शीशे जैसी वस्तु से आज ही परिचित हुए हो। चेहरे पर एकमात्र चिंता भूख से दुखते पेट की थी पर वह भी अमीरों के पड़ी जूठन से दूर हो जाती थी।         ...

दरिंदे

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                                कुचल गए जो फूल को वह कांटे कुछ साल और पनपेंगे। मां आस लगाए इस बेरुखी सरकार से, वह सरकार तो नींद से कुछ साल बाद ही उठेगी।  जिंदा जला गए बेरहम गुड़िया को,  गुनहगार कि अभी कुछ साल और खातिरदारी होगी,  तब कहीं जाकर सरकार की नींद खुलेगी  और शायद ही उनको सजा मिलेगी।  दरिंदों को डर नहीं अभी वह कितने क़त्ल करेंगे, ए बहरी सरकार सुन ले,  अपनी पर बात आने से पहले संभाल ले। यह तड़प से तुम गुस्सा दिखा रही हो,  रोड में मोमबत्ती जलाकर और खिलाफ आवाज उठा कर,  कुछ समय बाद तुम भी भूल जाओगे , पर मां न्याय की आस में हर पल तड़पते रहेगी।  वह बाप जिसकी परी के तुम पंख काट गए , उसमें तुम न जाने कितने सपने थे।  वह आजाद हवा में अपनी परी को उड़ाना चाहता था,  उसे क्या पता था दरिंदे बांज उसे नोच खायेंगे। **********

प्रेम

दुनिया में मौजूद सभी रिश्तो की एक अहम है कड़ी है :प्रेम, चाहे इंसान का इंसान से सम्बन्ध हो या जानवर का इंसान से, बिना प्रेम के संबंधों का यथार्थ रूप में धरातल में रहना उतना ही कठिन होता, जितना बिना सूर्य के इस धरती के जीवन की कल्पना करना। आखिर प्रेम कहाँ से आता है? अगर धरती पर यह मौजूद है तो हर किसी से इसका अनुभव होना चाहिये था परन्तु ऐसा नहीं है तो प्रेम का वजूद क्या है?           इन सभी प्रश्नों के ढेरों ने अनायाश ही मेरे मस्तिष्क में अपना डेरा बना लिया है, जहाँ तक मैं इनका हल सोच सकती है, प्रेम हमारे भीतर ही मौजूद है बस हम उसे महसूस करने का जरिया किसी अन्य को बनाते है, अब प्रश्न यह उठता है कि जब स्वयं के भीतर ही प्रेम का सागर है तो हम एक बूंद के लिए दूसरे पर निर्भर क्यों रहते हैं ?          हमें खुद को अच्छा बताया जाना, तारिफ सुनना इतना पसन्द होता है कि उसके लिए हम दूसरे की तारिफ करने लगते है ताकि हमें उनको तारिफ के वे बादल मिले जो हमें बारिश रूपी सुकुन दे सके, जब इन्सान स्वयं में ही प्रेम से परिपूर्ण है तो उसको दूसरे पर ही ...

दोस्त

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  एक रिश्ता जो हम खुद बनाते है,   उसका नाम है दोस्ती। ज़िन्दगी कोरे पन्नो की एक किताब थी,  भर गई  जिन एहसासों से उसका नाम है दोस्ती। यूं तो कही लोग आते है ज़िन्दगी में  महज़ एक अजनबी  बनके,  पर कुछ रह जाते है  यादो के किसी कोने में, एक दोस्त बनके। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहें। स्कूल की पुरानी यादें हार ना जा तू अभी से मातृ भाषा   नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा।   आज मैं कैसे हार सकती हूं तूफान लाख पथ में काँटे हो   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  ज़िंदगी की वास्तविकता ज़िंदगी में सकारात्मकता प्रेरणादायक विचार चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को ख़ुशी पर कविता:परी हिंदी भाषा किताब आंखिर क्यों?

आंखिर क्यों?

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                                    वक्त का पहिया तेज चल रहा है,  ना जाने क्यों आंखें मूंद खड़ी हुई हूं मैं। लकीरे मेरी हाथों की बेशक  लंबी है,  ना जानें क्यों उनको काट रही हूं मैं। कदम जो मैंने तय किए थे आसमां छूने के, ना जाने क्यों उन कदमों से मुंह फेर रही हूं मैं। कभी संघर्ष किया धरती से बाहर आने में, अब क्यों धरती में वापस जाना चाहती हु मैं। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहें। स्कूल की पुरानी यादें हार ना जा तू अभी से मातृ भाषा   नन्हा पौधा तूफान वो संघर्ष करता रहा।   आज मैं कैसे हार सकती हूं लाख पथ में काँटे हो   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  ज़िंदगी की वास्तविकता ज़िंदगी में सकारात्मकता प्रेरणादायक विचार चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को ख़ुशी पर कविता:परी हिंदी भाषा ...

पापा

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                                                                       कौन कहता है मैं आपसे दूर हूँ,  खुद की परछाई में भी मैं आपको पाती हूँ। अक्सर जब भी मैं खुद को देखु, बस आपकी ही मौजुदगी नज़र आती है। हूबहू आपसे मिलता मेरा चेहरा महसूस  नही होने देता कि मैं आपसे दूर हूँ।  जब कभी याद सताती है आपकी, मैं  आईने के पास बैठ जाती  हूँ, उसमें खुद को नहीं बस आपको ही पाती हूँ। कितने सवाल पूछती और कितनी बाते किया करती हूँ,  उस आईने को मैं जी भर के निहारा करती हूं। मेरी धड़कनो की आवाज में भी आपकी ही आवाज पाती हूँ,   कौन कहता है मैं आपसे दूर हूँ। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहें। स्कूल की पुरानी यादें हार ना जा तू अभी से मातृ भाषा   आँखिर क्यों? तूफान नन्हा पौधा वो...

यादें

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                                                                           आज स्कूल के सामने से गुजरी, लगा की कुछ कह रहा हो वो मुझसे। मैं रुकी कुछ लम्हे गुजारने,  कुछ समझने उसके ख़ामोशी के सवांद। दोस्तों के साथ हँसना, खेलना, सब बयाँ कर रही थी वो दीवारे मुझसे।😍 हाँ ,वो  दीवारे जिनको हमने खूब सताया था , और अपनी नादानी  से उनको सजाया था।  जीतने बार दीवारों में पेंट होता,  हम उतनी बार उसमे  कलाकारी दिखाते थे।  आज भर आयी आँखे मेरी,  ये अनकहे से शब्द सुनके और  कुछ पलों को याद करके।   पास में ही मेरे ये सब देख कोई मुस्कुरा रही,  आवाज सुन मैं पलटी उधर,  वो लताएं मुझसे जैसे कुछ कहना चाह रही। हँस रही थी वो जोरो से , कह रही कि अक्सर तू मेरे बालों को खींचती थी,  और मुझमे झूला करती थी।  शब्द खो चुके थे मेरे बस मानो बेजान सी मैं सुनते रही। ...

प्रेरणादायक कविता : नन्हा पौधा

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सत्य, अहिंसा, परिश्रम,ज्ञान के रास्ते  एक नन्हा पौधा चल पड़ा था मुकाम पाने।  ज़ख्मी  थे पैर गर जूनून उसका बुलंद था टूटकर, थक कर भी वो निरंतर चलता था। जब प्रतिद्वंदी उसके जड़ो में तेजाब डाल सुखाने आए  वो जड़ों को अपने ,ज्ञान से और फैलाता चला गया। आसमां  में घर बनाने के कई रास्ते थे मगर,  रिश्वत की ईंट नही वो मेहनत की ईंट  लेकर चलता। आंधी से घबराया नहीं वो, डटा रहा अपने आत्मविश्वास से, कई शाखाओं, पत्तो को खो कर भी जीतने की राह बुनता रहा। जितने बार उसे जिसने गिराना चाहा, अपने हौसले से उठ खड़े होकर दिखाया। निरंतर प्रयास और मेहनत  से वो  छू आसमां को, आज सत्य की राह दिखा कर कई नन्हे पौधों की प्रेरणा बन रहा। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - स्कूल की पुरानी यादें पतंग आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , मातृ भाषा बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख प...

Motivational quotes

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Quotes           सफर में चलना शुरू किया है  वाकई  कठिन होगी डगर , कई  ठोकरे खाउंगी ,  कई बार गिरूँगी  पर जीतने की कोशिश मैं हजार करूंगी। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - स्कूल की पुरानी यादें ओस का मोती पतंग   नन्हा पौधा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , मातृ भाषा बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती 

याद

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  आज यादो की खिड़की मै झांका तो कुछ ऐसे पल याद आए  जिनको याद रखने के लिए मै सबकुछ भूलने को तैयार हूँ। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इन पंक्तियों को पढ़ने के लिए धन्यवाद।  ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं नन्हा पौधा भाषा पतंग वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे तूफान

तूफान

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 एक दिन धरती बोली तूफान से  मुझसे उद्भिज़ एक पौंधा  अक्सर मुझे आंखें दिखाता था, मेरा संघर्ष जाने बिना, वो मुझे नीचा दिखाता था। एक दिन वो दर्भ से लड़ा, सच्चाई, ज्ञान, सत्य के तूफान से। क्षण भर भी वो टिका नहीं; गिरा पड़ा वो मेरे कदमों में।                          *********** अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - स्कूल की पुरानी यादें आज मैं कैसे हार सकती हूं भाषा पतंग वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे

सन्नाटा

 "सन्नाटे के शोर से डरने लगा हूं मैं, अब कोई शोर करके इस सन्नाटे के शोर को चुप करा दे।"             ******************** मेरीऔर पोस्ट यहां पढ़ें -- स्कूल की पुरानी यादें हार ना जा तू अभी से मातृ भाषा   नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा।   आज मैं कैसे हार सकती हूं लाख पथ में काँटे हो   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  ज़िंदगी की वास्तविकता ज़िंदगी में सकारात्मकता प्रेरणादायक विचार

मोती

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ओस के मोती के लिए कितने मोती बनाओगे,  एक दिन इन मोती का नष्ट होना तो तय है।   मेरी और भी पोस्ट पढ़े - स्कूल की पुरानी यादें नन्हा पौधा हार ना जा तू अभी से मातृ भाषा   वो संघर्ष करता रहा।   आज मैं कैसे हार सकती हूं लाख पथ में काँटे हो   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  ज़िंदगी की वास्तविकता ज़िंदगी में सकारात्मकता प्रेरणादायक विचार

हिंदी

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                सहमी सी,सिसकती आंखें;  छुपकर दरारों से देखती; वहीं अंग्रेजी बाहर शोर मचाती,  सबका सम्मान पाती है। जो गुलामी के जंजीरों को  तोड़ने की ताकत रखती थी, आज  खुद गुलामी के जंजीरों में लिपटी , वो लाचार सबका तिरस्कार पाती है। जो हिंदी कभी सम्मान थी,  जिसकी आबरू बचाने को कई लोग शहीद हुए , आज शायद ही वो अपनी चाल से कभी चलती होगी, अक्सर हिंग्लिश के नाम से विदेशी रेखा  उसको चलाती है। गुणगान उसके संघर्ष की , अब माटी में मिले वीरों के लहू ही गुनगुनाते है,  यहां तो हिंदी जुबान पर लाने को अब  लोग कतराते हैं। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं भाषा पतंग नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा। तूफान   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत...

बादल

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                                पथ भ्रमित सा हूं मैं। कदम खुद के असमर्थ बना, पद चिन्हों में हवाओं के; भटकता रहता हूं मैं। तेज रुख करे जो हवा , साथ उसके, मंजिल पाने; बिना अपना सामर्थ्य जाने, आँख मूंद चल पड़ता हूं मैं।  आधी राह में ही हार कर, छिन्न भिन्न सा होकर, बिखर जाता हूं मैं। ***** अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं ओस का मोती पतंग नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। ख़ुशी पर कविता:परी  

शब्द

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"शब्द तो मेरे ही थे, जो दुनिया के मुंह पर थे; बस कुछ बुनकर कुछ सिनकर उनमें टुकड़े जोड़े थे।" अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं नन्हा पौधा भाषा पतंग वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे

मातृ भाषा

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तेजी से बदल रहे इस दौर में, अधिकतर लोग अपनी मातृ भाषा को छोड़कर अन्य भाषा के साथ सहज महसूस करते हैं और अपने ही मूल से दूर होते जा रहे हैं ,जिसके वजह से  कहीं ना कहीं अन्य भाषा उनके जीवन में अपनी पैंठ बना रही है। अपनी मातृ भाषा के पलायन को हमें रोकना होगा वरना धीरे धीरे एक दिन हम अपने मूल को खो देंगे। इसी को मद्देनजर रखते हुए मैंने कुछ पंक्तियां लिखी हैं; माना तुझसे लिपटकर मैं, अपना ओहदा बड़ा बना लूंगा। यकीनन पूछ मेरी सर्वत्र होगी, और पहचान मेरी ऊंची होगी। रंगीन आवरण से ढका रहूँगा, एक अच्छी खुशबू में घिरा हूंगा। पर ये जीत मेरी शून्य है, अगर जड़े मेरी कमजोर हैं। ***** अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - हिंदी भाषा आज मैं कैसे हार सकती हूं ओस का मोती पतंग नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा। स्कूल की पुरानी यादें   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय ...

पतंग

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 बहुत दूर चले आयी वो पतंग। छत के कोने पर खड़ा वो नादान सा बालक, निर्भीक होकर जीत अपनी आज़िम कर; मानो पतंग रूपी सपनों को  उड़ा रहा। अमूमन पतंग की डोर उंगलियों को चूब रही होगी। फिर भी वो भूल दर्द को एकटक , अपने सपनो की उड़ान को ढील देते  , मानो आसमां को अपनी मेहनत  से चिड़ा रहा है।     अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - ओस का मोती पापा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा। मातृ भाषा नन्हा पौधा मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। ख़ुशी पर कविता:परी

प्रेरणादायक कविता : कदम थोड़ा तेज बड़ा।

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कदम थोड़ा तेज बड़ा, यहां जंग जारी है।  तराश खुद को तू ,खुद को नया बनाने में।   सिमटा न रह चंद कागज की सफलताओं में। खुले आसमां में पतंग उड़ाना कहा मुश्किल है,  उड़ा पतंग तू तूफानों के शोरों में।    है निरर्थक पूछ तेरी, अगर खड़ा है तू उपजाऊ भूमि में, अगर है हिम्मत तो उग कर दिखा बंजर भूमि में।   मत बैठ मेहनत असीर कर लकीरो की ओट में, इन लकीरों का तू गुलाम नहीं बता दे इस दुनिया में।  उस नाम का भी क्या जो लिखा गया हो पानी में, बन ऐसा की नाम छपे अमिट पत्थर की दीवारों में। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - पतंग नन्हा पौधा मातृ भाषा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। ख़ुशी पर कविता:परी स्कूल की पुरानी ...

प्रेरणादायक कविता :हार ना जा तू अभी से

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  हार ना जा तू अभी से, जीतने को अभी तो कई कदम बाकी हैं। खुली आंखों से देखे जो सपने तूने, उनमें अभी जान फुकनी बाकी है। देख वो नन्हा बीज, कैसे संघर्ष करता रहता है। दिन रात धूल पत्थर से लड़, एक पौंधा बनता है। देख एक पंछी कोमल पंखों से, कैसे अथाह आसमां को छू लेता है। गिरता वो भी होगा कई बार,  पर फिर भी कोशिश करता है। देख खाना लेकर एक नन्ही चींटी, गिरते ,फिसलते कई मील चलती है। शून्य पर भी पहुंचकर,  कैसे वो मंजिल पाती है। देख समुंद्र की विराट लहरों को,  कैसे एक छोटी नाव चुनौती देती है। लड़ कर उन लहरों से, वो  किनारे आती है।  "रोशनी" अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - पतंग नन्हा पौधा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , मातृ भाषा बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंद...

प्रेरणादायक कविता:-कैसे ये सफर पार नहीं होगा।

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 कैसे ये सफर पार नहीं होगा। माना भाग्य के पंख नही , जो उड़ कर पार होगा, मेहनत के कदम तो हैं , तो चलकर पार होगा। आंसुओ की धार में है  लिपटे कई रिश्ते, कई सुविधाएं, तो कई किस्से। बहाकर इन आंसुओ को, चल पड़ी हूं जब सफर में, तो कैसे ये सफर पार नहीं होगा।  संघर्ष पथ पर मैं चल पड़ी हूं, कभी खुद से तो कभी अपनो से लड़ी हूं। कई खुशियो को मैने फांसी लगाई है, तो कई दफा हृदय पाषाण भी बनाया है, दिए जब मैंने इतने बलिदान, तो कैसे ये सफर पार नहीं होगा। माना मुश्किल बहुत आएंगी, कभी डरूंगी,तो कभी हार जाऊंगी। कभी खुद को खुद से ही दूर पाऊंगी, कदमों में है जब भरोसे का जूता, तो कैसे ये सफर पार नहीं होगा। ***** अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - हार ना जा तू अभी से     नन्हा पौधा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होग...

आज मैं कैसे हार सकती हूं।

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                                                           अडिग रही उस पथ पर  अंगारों का जहाँ दरिया था। आज धूप में चलने से , मैं कैसे रुक सकती हूं। लड़ सागर की लहरों से , पाई जब मैंने मंजिल। आज दरिया में गोता लगाने से,  मैं कैसे डर सकती हूं। तोड़ तानों के पिंजरे को , उड़ गई ऊंचाइयों में। आज दुनिया की बातें सुन , मैं कैसे हार सकती हूं। चीर पत्थर की छाती को , संघर्ष से जब खड़ी हुई। आज कंकड़ के टुकड़े से , मैं कैसे दब सकती हूं। **** अपना कीमती वक़्त देकर इस पोस्ट को पढ़ने के   धन्यवाद , आपको यह पोस्ट कैसी लगी जरूर बताईयेगा।  मेरी और भी पोस्ट यहाँ पढ़े :- स्कूल की पुरानी यादें हार ना जा तू अभी से वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे ज़िंदगी की वास्तविकता ज़िंदगी में सकारात्मकता प्रेरणादायक विचार चलो आज एक नयी ज...