पतंग




 बहुत दूर चले आयी वो पतंग।

छत के कोने पर खड़ा वो नादान सा बालक,

निर्भीक होकर जीत अपनी आज़िम कर;

मानो पतंग रूपी सपनों को  उड़ा रहा।


अमूमन पतंग की डोर उंगलियों को चूब रही होगी।

फिर भी वो भूल दर्द को एकटक ,

अपने सपनो की उड़ान को ढील देते  ,

मानो आसमां को अपनी मेहनत  से चिड़ा रहा है। 

  

अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे। 

मेरी और भी पोस्ट पढ़े -

ओस का मोती

पापा

आज मैं कैसे हार सकती हूं










Comments

Popular posts from this blog

दोस्त

Motivational quotes

प्रेरणादायक कविता :हार ना जा तू अभी से