आंखिर क्यों?

                                   

वक्त का पहिया तेज चल रहा है, 
ना जाने क्यों आंखें मूंद खड़ी हुई हूं मैं।
लकीरे मेरी हाथों की बेशक  लंबी है, 
ना जानें क्यों उनको काट रही हूं मैं।
कदम जो मैंने तय किए थे आसमां छूने के,
ना जाने क्यों उन कदमों से मुंह फेर रही हूं मैं।
कभी संघर्ष किया धरती से बाहर आने में,
अब क्यों धरती में वापस जाना चाहती हु मैं।

अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहें।

स्कूल की पुरानी यादें
















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