तूफान
एक दिन धरती बोली तूफान से
मुझसे उद्भिज़ एक पौंधा
अक्सर मुझे आंखें दिखाता था,
मेरा संघर्ष जाने बिना,
वो मुझे नीचा दिखाता था।
एक दिन वो दर्भ से लड़ा,
सच्चाई, ज्ञान, सत्य के तूफान से।
क्षण भर भी वो टिका नहीं;
गिरा पड़ा वो मेरे कदमों में।
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अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।
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