आज मैं कैसे हार सकती हूं।
अडिग रही उस पथ पर
अंगारों का जहाँ दरिया था।
आज धूप में चलने से ,
मैं कैसे रुक सकती हूं।
लड़ सागर की लहरों से ,
पाई जब मैंने मंजिल।
आज दरिया में गोता लगाने से,
मैं कैसे डर सकती हूं।
तोड़ तानों के पिंजरे को ,
उड़ गई ऊंचाइयों में।
आज दुनिया की बातें सुन ,
मैं कैसे हार सकती हूं।
चीर पत्थर की छाती को ,
संघर्ष से जब खड़ी हुई।
आज कंकड़ के टुकड़े से ,
मैं कैसे दब सकती हूं।
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