आज मैं कैसे हार सकती हूं।


                                                           अडिग रही उस पथ पर 

अंगारों का जहाँ दरिया था।

आज धूप में चलने से ,

मैं कैसे रुक सकती हूं।


लड़ सागर की लहरों से ,

पाई जब मैंने मंजिल।

आज दरिया में गोता लगाने से,

 मैं कैसे डर सकती हूं।


तोड़ तानों के पिंजरे को ,

उड़ गई ऊंचाइयों में।

आज दुनिया की बातें सुन ,

मैं कैसे हार सकती हूं।


चीर पत्थर की छाती को ,

संघर्ष से जब खड़ी हुई।

आज कंकड़ के टुकड़े से ,

मैं कैसे दब सकती हूं।

****

अपना कीमती वक़्त देकर इस पोस्ट को पढ़ने के  धन्यवाद,आपको यह पोस्ट कैसी लगी जरूर बताईयेगा। 

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