बादल

                               


पथ भ्रमित सा हूं मैं।

कदम खुद के असमर्थ बना,

पद चिन्हों में हवाओं के;

भटकता रहता हूं मैं।


तेज रुख करे जो हवा ,

साथ उसके, मंजिल पाने;

बिना अपना सामर्थ्य जाने,

आँख मूंद चल पड़ता हूं मैं। 


आधी राह में ही हार कर,

छिन्न भिन्न सा होकर,

बिखर जाता हूं मैं।

*****


अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे। 

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