पापा

                                                      

               

कौन कहता है मैं आपसे दूर हूँ, 

खुद की परछाई में भी मैं आपको पाती हूँ।

अक्सर जब भी मैं खुद को देखु,

बस आपकी ही मौजुदगी नज़र आती है।

हूबहू आपसे मिलता मेरा चेहरा

महसूस  नही होने देता कि मैं आपसे दूर हूँ। 

जब कभी याद सताती है आपकी,

मैं  आईने के पास बैठ जाती  हूँ,

उसमें खुद को नहीं बस आपको ही पाती हूँ।

कितने सवाल पूछती और कितनी बाते किया करती हूँ, 

उस आईने को मैं जी भर के निहारा करती हूं।

मेरी धड़कनो की आवाज में भी आपकी ही आवाज पाती हूँ, 

 कौन कहता है मैं आपसे दूर हूँ।


अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहें।

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