वो संघर्ष करता रहा।
वो रेत सा उड़ पहाड़ों से संघर्ष करता रहा,
मैं बंद मुट्ठी में बैठ लकीरें गिनता रहा।
वो छू आसमां, पहचान बनता रहा,
मैं हार कर, उसके संघर्ष सुनते रहा।
वो अपनी हर कमी को कामयाबी का द्वार बनाता रहा,
मैं कमी खुद में ही हजार ढूढता रहा।
लहरों से लड़ वो उस किनारे आगया,
मैं नाव जल में उतारने से घबराता रह गया।
राह अपने बनाकर वो, सफल हो गया।
मैं उसकी राहों में ही भटकता रह गया।
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अपना कीमती वक़्त देकर इस पोस्ट को पढ़ने के धन्यवाद,आपको यह पोस्ट कैसी लगी जरूर बताईयेगा।
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Awseme superb kya likhti Ho Aap
ReplyDeleteVery very good
ReplyDeleteAwesome superb 👍
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