यादें
आज स्कूल के सामने से गुजरी,
लगा की कुछ कह रहा हो वो मुझसे।
मैं रुकी कुछ लम्हे गुजारने,
कुछ समझने उसके ख़ामोशी के सवांद।
दोस्तों के साथ हँसना, खेलना,
सब बयाँ कर रही थी वो दीवारे मुझसे।😍
हाँ ,वो दीवारे जिनको हमने खूब सताया था ,
और अपनी नादानी से उनको सजाया था।
जीतने बार दीवारों में पेंट होता,
हम उतनी बार उसमे कलाकारी दिखाते थे।
आज भर आयी आँखे मेरी,
ये अनकहे से शब्द सुनके और
कुछ पलों को याद करके।
पास में ही मेरे ये सब देख कोई मुस्कुरा रही,
आवाज सुन मैं पलटी उधर,
वो लताएं मुझसे जैसे कुछ कहना चाह रही।
हँस रही थी वो जोरो से ,
कह रही कि अक्सर तू मेरे बालों को खींचती थी,
और मुझमे झूला करती थी।
शब्द खो चुके थे मेरे बस मानो बेजान सी मैं सुनते रही।
अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।
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ReplyDeleteAwesome superb keep it up
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