मातृ भाषा

तेजी से बदल रहे इस दौर में, अधिकतर लोग अपनी मातृ भाषा को छोड़कर अन्य भाषा के साथ सहज महसूस करते हैं और अपने ही मूल से दूर होते जा रहे हैं ,जिसके वजह से  कहीं ना कहीं अन्य भाषा उनके जीवन में अपनी पैंठ बना रही है। अपनी मातृ भाषा के पलायन को हमें रोकना होगा वरना धीरे धीरे एक दिन हम अपने मूल को खो देंगे।

इसी को मद्देनजर रखते हुए मैंने कुछ पंक्तियां लिखी हैं;



माना तुझसे लिपटकर मैं,

अपना ओहदा बड़ा बना लूंगा।

यकीनन पूछ मेरी सर्वत्र होगी,

और पहचान मेरी ऊंची होगी।

रंगीन आवरण से ढका रहूँगा,

एक अच्छी खुशबू में घिरा हूंगा।

पर ये जीत मेरी शून्य है,

अगर जड़े मेरी कमजोर हैं।

*****

अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे। 

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वो संघर्ष करता रहा।









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