किताब
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सहमी सी पड़ी वो,
एक पुरानी सी अलमारी में ,
ताकती दिन-रात,
धूल भरे शीशे के कोने से।
खुद की आबरू बिक जाने की डर में,
चुप चुप सी रहती,
उस अलमारी के कोने में।
जो कभी सिरहाने मैं पड़ी रहती,
तो कभी देर रात तक हमसे बातें करती,
वो हमारी नींद और खुद में,
बड़ी जुस्तजू करती दिखती थी।
आज बेजुबान सी पड़ी रहती,
उस अलमारी के कोने में।
एकटक निहारती,
वो बीते पलो को याद कर ,
उस मंज़र के फिर से होने की राह तकती है।
मिटते शब्दो की स्याही से बयाँ होता ,
वो खूब आंसू बहाती ,
उस सुनसान सी,
अलमारी के कोने में।
सबकी आँखे टिकी रहती ,
अब एक छोटे से डब्बे में।
देख ये नज़ारा मचलती वो किताबें,
कुछ गुफ्तगू करने को,
कुछ खुद की कहने और,
कुछ हमारी सुनने को।
पर खौप से चुप रहती ,
उस अलमारी के कोने में।
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अपना कीमती वक़्त देकर इस पोस्ट को पढ़ने के धन्यवाद,आपको यह पोस्ट कैसी लगी जरूर बताईयेगा।

Bhot hi achi he very nice all the best
ReplyDeleteGood
ReplyDeleteVery good
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