पढ़ाई में मन लगाने के लिए कहानी

 पढाई ना करने के हजारों बहाने जो मेरे लक्ष्यों से भी ऊंचे कद के थे, मैं बहानों को सत्य सिद्ध करने को कई तर्कों को बुनने लगी। मन में छिड़ी इस बहस पर खलल डालते हुए नन्हे बच्चों की किलकारी ने बहस पर अनिश्चित समय के लिए रोक लगा दी थी। खिड़की से बाहर झांका तो चार बच्चे 'चार लोग क्या कहेंगे' की उक्ति के कठोर विरोधक; बिना किसी दिखलावट के नाचते हंसते मानो संसार के सभी दुखों, बंधनों से मुक्त एक आजाद पंछी की तरह प्रकृति के कोमल स्पर्शो को महसूस करते हुए आनंद के आकाश में गोता लगा रहे हो।

         उनके चेहरे कि प्राकृत मुस्कान के पीछे छिपी कई जिम्मेदारी ,दुख ,अभाव को मैं स्पष्ट रूप से देख सकती थी। महज  छः वर्ष की बच्ची, 

मां की जिम्मेदारी निभाते छः महीने के भाई को पीठ में चुनरी के सहारे बांधे दोनों हाथों से महज दो और तीन साल के भाई को पकड़े एक गाड़ी के शीशे में खुद को देखकर उत्साहित हो रहे थे मानो शीशे जैसी वस्तु से आज ही परिचित हुए हो। चेहरे पर एकमात्र चिंता भूख से दुखते पेट की थी पर वह भी अमीरों के पड़ी जूठन से दूर हो जाती थी।

         कुछ देर पहले चल रहे तर्क वितर्क पर शर्मिंदा होकर मैं फिर से किताबों के पास बैठी भगवान को धन्यवाद देती मेरी आंखें जो कुछ देर पहले नींद से सराबोर थी अब मानो नीद को भूल चुकी हो। किताबों को पढ़ पाने की जो किस्मत लिए मैं ,उससे ही दूर भाग रही थी उस पर अफसोस करते हुए एक नए उत्साह के साथ किताबों के पन्नों को खोल रही थी। कद बहानों का इतना छोटा पड़ गया था जो ढूढने पर भी नहीं मिल रहा था...…...


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