हिंदी
सहमी सी,सिसकती आंखें; छुपकर दरारों से देखती; वहीं अंग्रेजी बाहर शोर मचाती, सबका सम्मान पाती है। जो गुलामी के जंजीरों को तोड़ने की ताकत रखती थी, आज खुद गुलामी के जंजीरों में लिपटी , वो लाचार सबका तिरस्कार पाती है। जो हिंदी कभी सम्मान थी, जिसकी आबरू बचाने को कई लोग शहीद हुए , आज शायद ही वो अपनी चाल से कभी चलती होगी, अक्सर हिंग्लिश के नाम से विदेशी रेखा उसको चलाती है। गुणगान उसके संघर्ष की , अब माटी में मिले वीरों के लहू ही गुनगुनाते है, यहां तो हिंदी जुबान पर लाने को अब लोग कतराते हैं। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे। मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं भाषा पतंग नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा। तूफान मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा कितना है समय कीमती एक जीत...