शब्द
"शब्द तो मेरे ही थे, जो दुनिया के मुंह पर थे; बस कुछ बुनकर कुछ सिनकर उनमें टुकड़े जोड़े थे।" अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे। मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं नन्हा पौधा भाषा पतंग वो संघर्ष करता रहा। मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा कितना है समय कीमती एक जीत है तेरे आगे