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Showing posts from August, 2021

शब्द

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"शब्द तो मेरे ही थे, जो दुनिया के मुंह पर थे; बस कुछ बुनकर कुछ सिनकर उनमें टुकड़े जोड़े थे।" अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - आज मैं कैसे हार सकती हूं नन्हा पौधा भाषा पतंग वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे

मातृ भाषा

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तेजी से बदल रहे इस दौर में, अधिकतर लोग अपनी मातृ भाषा को छोड़कर अन्य भाषा के साथ सहज महसूस करते हैं और अपने ही मूल से दूर होते जा रहे हैं ,जिसके वजह से  कहीं ना कहीं अन्य भाषा उनके जीवन में अपनी पैंठ बना रही है। अपनी मातृ भाषा के पलायन को हमें रोकना होगा वरना धीरे धीरे एक दिन हम अपने मूल को खो देंगे। इसी को मद्देनजर रखते हुए मैंने कुछ पंक्तियां लिखी हैं; माना तुझसे लिपटकर मैं, अपना ओहदा बड़ा बना लूंगा। यकीनन पूछ मेरी सर्वत्र होगी, और पहचान मेरी ऊंची होगी। रंगीन आवरण से ढका रहूँगा, एक अच्छी खुशबू में घिरा हूंगा। पर ये जीत मेरी शून्य है, अगर जड़े मेरी कमजोर हैं। ***** अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - हिंदी भाषा आज मैं कैसे हार सकती हूं ओस का मोती पतंग नन्हा पौधा वो संघर्ष करता रहा। स्कूल की पुरानी यादें   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय ...

पतंग

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 बहुत दूर चले आयी वो पतंग। छत के कोने पर खड़ा वो नादान सा बालक, निर्भीक होकर जीत अपनी आज़िम कर; मानो पतंग रूपी सपनों को  उड़ा रहा। अमूमन पतंग की डोर उंगलियों को चूब रही होगी। फिर भी वो भूल दर्द को एकटक , अपने सपनो की उड़ान को ढील देते  , मानो आसमां को अपनी मेहनत  से चिड़ा रहा है।     अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - ओस का मोती पापा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा। मातृ भाषा नन्हा पौधा मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। ख़ुशी पर कविता:परी

प्रेरणादायक कविता : कदम थोड़ा तेज बड़ा।

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कदम थोड़ा तेज बड़ा, यहां जंग जारी है।  तराश खुद को तू ,खुद को नया बनाने में।   सिमटा न रह चंद कागज की सफलताओं में। खुले आसमां में पतंग उड़ाना कहा मुश्किल है,  उड़ा पतंग तू तूफानों के शोरों में।    है निरर्थक पूछ तेरी, अगर खड़ा है तू उपजाऊ भूमि में, अगर है हिम्मत तो उग कर दिखा बंजर भूमि में।   मत बैठ मेहनत असीर कर लकीरो की ओट में, इन लकीरों का तू गुलाम नहीं बता दे इस दुनिया में।  उस नाम का भी क्या जो लिखा गया हो पानी में, बन ऐसा की नाम छपे अमिट पत्थर की दीवारों में। अपना बहुमूल्य समय देकर मेरी इस कविता को पढ़ने के लिए धन्यवाद। आपको यह कविता कैसी लगी हमे जरूर बताईएगा। ऐसे ही अन्य पोस्ट पढने के लिए हमारे साथ बने रहे।  मेरी और भी पोस्ट पढ़े - पतंग नन्हा पौधा मातृ भाषा आज मैं कैसे हार सकती हूं वो संघर्ष करता रहा।   मैं अपनी ही प्रेरणा हूँ , बंद मुट्ठी मे बैठ तराश रहा हूं मैं खुद को लाख पथ में काँटे हो तुझे चलना ही होगा   कितना है समय कीमती  एक जीत है तेरे आगे चलो आज एक नयी जिंदगी लिखते हैं। ख़ुशी पर कविता:परी स्कूल की पुरानी ...